कुछ उर्दु की रचनाये जो अछ्छी लगती हे ॥

Manzar Bhopali            मजंर भोपाली

जबांन-ए-हिन्द हे उर्दु तो माथे की शिकन क्यो हे        वतन मे बेवतन क्ये हे?

मेरी मजलुम उर्दु तेरी सांसो मे घुटन क्यो हे        तेरा लहजा महकता हे तो लफ्जो मे थकन क्यो हे ?

अगर तु फुल हे तो फुल मे इतनी चुभन क्यो हे        वतन मे बेवतन क्यो हे

ये नानक की ये खुसरो की दया शकंर की बोली हे        ये दि‌वाली ये बेसाखी ये इद-उल-फितर होली हे

मगर ये दिल की धडकन आज कल दिल की जलन क्यो हे    वतन मे बेवतन क्यो हे

ये नांजो से पाली थी मीर के गालीब के आंगन मे         जे सुरज बन के चमकी थी कभी महलो के दामन मे

ये शहजादी जबान की ये बे-अन्जुमन क्यो हे        वतन मे बेवतन क्यो हे

मोहबत का सभी एलान कर जाते हे मेहफिल मे         के इस के वासते जजबा हे हमदर्दी के हर दिल मे

मगर हक मांगने के ‌वक्त ये बेगानापन क्यो हे         वतन मे बेवतन क्यो हे

ये दोशिजा जो बाजारो से इटलाती गुजरती थी        लबो की नाजुकी जिस की गुलाबो से बिखरती थी

जो तहजिबो की सर की ओडनी अब कफन क्यो हे         वतन मे बे-वतन क्यो हे

मोहबत का अगर दावा हे तो इस को बचाओ तुम        जो वादा किया था आज वो वादा निभाओ तुम

अगर तुम राम हो तो फिर ये रावन का चलन क्यो हे         वतन मे बेवतन क्यो हे

Meer Taqi Meer (1722-1810) Born in village close to Agra, Moved to Delhi , migrated to Delhi, Died a  pauper in 1810, Grave demolished to make space for city Railway Station.

Shaikh Gulam Hamdani Mus-Hafi ( 1747-18230 Born Amroha, moved Delhi in court of Shah Alam. Den moved to Lucknow under Nawab,  but got replaced by Insha.

हसरते उस मुसाफिर ए बेकस की रोइये         जे थक के बेठ जाता हे मंजिल के सामने

Bahadur Shah Zafar (1775-1862)

जफर आदमी उसको न जानियेगा वह हो कैसा ही साहाब-ए-फहमो-जका का

जिसे ऐस मे याद-ए-खुदा न रही जिसे तैस मे खोफ-ए-खदा न रहा

हिन्दुस्तान की भी अजब सर जमीन हे

जिसमे वफा-ओ-मोहब्बत का हे वफूर

जैसे कि आफताब निकलता हे शर्क से

इखलास हुवा हे इसी मुल्क से जहूर

हे अस्ल तुख्म-ए-हिन्द और इस जमीन से

फैला हे इस जहां जे ये मेवा दूर दूर

(Translation by Kushwant Singh

Matchless is the soil of Hindustan (India)

in it grew  love , compassion and fidelity,

As sure as the sun rises from the east

So surges from this land sincerity,

This is the true seen of Hind and from its earth

These fruits have spread across the world , far and wide)

( Attributed to Bahadur Saha Zafar but believed to be the words of Muztar Kahirabadi)

I am not the light of anyone’s eye

I am not the comfort of anyone’s heart

Of no use to anyone am I:

I am just a fistful of dust.

Sahidh Ibraham Zauq (1789- 1854) Delhi royal poet under Bahadur Saha Zafar

कब हक परस्त जाहिद-ए-जन्नत-परस्त हे     हुरों पे मर रहा हे ये शहवत परस्त हे

मिर्जा ओसदुल्ला खान गालिब

मेहरबा होके बुलालो मुझे चाहो जिस वक्त        मे गया वक्त नही कि फिर आ भी न सकू

नादां हे जो कहते हे कि क्यो जीते हो गालिब    किस्मत मे हे मरने की तमन्ना कोई दिन और

गालिब छुटी शराब पर अब भी कभी – कभी    पीता हूं रोज-ए-अब्र-ओ-शब-ए-महताब मे

गो हाथ मे जुबिंश नही आखो मे तो दम हे    रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

Hakim Momin Khan Momin, Delhi 1801 – 1852

कुछ लोग हे खामोश

मगर सोच रहे हे

सच बोलेगे तब

सच के दाम बडेगें

( Kushwant Singhs translation:

There are soem who reamin silent

But are sunk in deep surmise,

Yes, they will speak the truth,

But when the price of truth is on the rise)

उम्र सारी तो कटी इश्क-ए-बुतां मोमिन        आखरी वख्त मे क्या खाक मुसलमां होगे

Momin , in the love of idols and idolters your life was spent,

Now that it ends, what hop do you have of being Muslim and repent?

वो जो हममे तममे करार था तम्हे याद हो कि न याद हो

वही यानी वादा निबाह का तुम्हे याद हो कि न याद हो

वह जो लुत्फ मझपे थे वह करम कि था मेरे हाल पर

मुझे सब याद हे जरा-जरा तुम्हे याद हो के न याद हो

Nawab Mirza Khan Daag Dehlvi (1831-1905) Delhi by stpfather Mirza Muhammad Fakhroo , heir to Bahadur Saha Zafar. Worked in Court of Nawab of Rampur, invited by Nizam of Hyderbad in 1891. Teetotaler.

Akbar Hussain Akbar Allahbadi, 1846-1921,

बागो मे तो बहार दरखतो कौ देख ली

खालेज मे आ के कन्वोकेशन को देखिये

लीमू तो कागजी बहुत देखे हे आपने

अब कागजी तरक्की -ए-नेशन को देखिये

मजहबी बहस मेने की ही नही

फालतु अक्ल मुझ मे थी ही नही

पैदा हुआ वकील तो इबलीस के कहा

लो आज हम भी साहिबे-ओलाद हो गये

सागर -ए-मय हे सामने शैख से कह रहे हे सब

देखता क्या हे हर तरफ  मर्द-ए-खुदा चडा भी जा

Shaad Azimabadi , Patna 1846-1927,

सुनी हिकायते -हस्ती

तो दरमियां से सुनी

न इब्तदा की खबर हे

न इन्तहा मालूम

When I woke to the story of life

It was already the middle of the tale,

I know nothing of the beginning

I’ll know nothiing of the end.

Mohamd Iqbal, 1873-1938,

मोहमद इकबाल

यकीं, महकम , अमल , पैहम , मोहबत फातह-ए-आलम

जिहद-ए-जिंदगानी मे हे ये मर्दो की शमशीरे

( खुशवतं सिहं का अनुवाद:  Kushwant Singhs translation:

Man’s weapons in life’s battles are three:

Conviction that his cause is just

Courage to fight for it till eternity

Compassion that embraces all humanity.

खुदा तुझे किसी तुफां से आशना कर दे

कि केरे बहार की मोजों मे इजतिराब नही

May God grant you the experience of a storm:

The waves of your life’s ocean are too  calm.

शबाब आह कहां तक उमीदवार रहे

वो ऐश ऐश नही जिसका इंतजार रहे

Impatient youth! How long in hope can it go on living?

What joy is left in pleasuer that takes so long in coming?

शिकवा से थोठा भाग

क्यो जिया-कार बनु सुद-फरमोश रहू

फिक्र-ए-फरदा न  करुं महव-ए-गम -ए-दोश रहू

नाले बुलबुल के सुनुं ओर हमातन गोश रहू

हम नवा मै भी कोई गुल हू कि खामोश रहूं

जुर्अत -आमोज मेरी ताब-ए-सुखन हे मुझको

शिकवा अल्लाह से खाकम-बदहन हे मुझको

जबाबे शिकवा से थोठा भाग

हम तो माहल हे करम हे कोई साइल ही नही

राह दिखलाये किसे रहरवे मजिल ही नही

तरबियत आम तो हे जौहर काबिल ही नही

जिससे तामीर हो आदम की ये वह गिल ही नही

कोई काबिल हे तो हम शान -ए-कई देते हे

ढुढने वालो के दुनिया भी नई देते हे

देखकर रगं-ए-चमन हो न परेशा माली

कौकबे-गुचा से शाखे हे चमकने वाली

खसो-खशाक से होत हे गुलिस्ता खाली

गुलबर अंदाज हे खुने शुहदा की लाली

रंग गर्द का जरा देख तो उन्नाबी हे

ये निकलते हुये सुरज की उफकताबी हे

फिराख गोरखपुरी,    1896-1982

ए शेख, गर असर हे दुवा मे

तो मस्जिद हिला के दिखा

गर नही तो दो घुंट पी

औ मस्जिद को हिलता देख

(Kuswant Singh’s translation:

O holy man, if therer is power in your prayer

Let me see you make the mosque’s walls shake,

It not , come, take a swig or two fo wine

And watch how the mosque quakes)

Ghulam Rabbani Taban, 1914-1993, GM of  Maktab-i-Jamia in Delhi

जुस्तजू हो तो सफर खत्म कहां होता हे

यूं तो हर मोड पे मंन्जिल का गुमां होता हे

कोइ कुछ तो बतलाओ क्या जवाब दुं

एक सवाल करता हे रोज मुझसे घर मेरा

हबिब जलिल , 1928-1993, होसयारपुर पंजाब

तुझ से पहले जो इक शख्स यहां तखत नशी था

उसके भी अपने खदा होने का इतना ही यकीं था

कत्ल हो गया हम पे इल्जाम हे

कत्ल जिसने किया हे वही मुदई

वकिलो मे अब ये बहस छिड गयी

ये जो कातिल को थोडी सी जहमत हुइ

ये जो खंजर मे हलका सा खम आ गया

इसका तावान किससे लिया जायेगा

(Kushwant Singh’s translation:

Why did you allow yourself to be killed

Is the charge for which I am billed.

Now lawyers are arguing amongst themselves”

This small trouble that the killer has to take,

This little dent that his dagger suffered,

Who should be made to compensate? )

I like this  gazal of Sir Mohomad Iqbal.

I have transliterated into phonetic Hindi. Ignore the errors which are mine.

It is very sweet to hear and is also figured in Hindi movie  but I do not fully understand the same.

I would be very grateful for any help in this respect. Thanks.

1    कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में        के हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं  मेरी जबीन-ए-नियाज़ में

2    तरब आशना ए खरोश हो     तु नवा हे महाराम इ गोस हो          वो सारुर कया के छाया हुवा हो साकुत ए परदा ओ साज मे

3    तू बचा-बचा के  न रख इसे, तेरा आईना है वो आईना               के शिकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में

4    दाम ए तोफ कर एक शमा  ने ये काहा के व  असर क’हा          ना तेरी हाकियात ए सोज में नं मेरी हादिस ए गुदाज में

5    ना कही जाहांन में अमां मिली जो अमांन मिली तो काहां मिली      मेरे जुरम ए  खाना  ए खराब को  तेरे  अजो  ए  बांदा नवाज में

6    न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ, न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ                न वो ग़ज़नवी में तड़प रही      न वो खम है ज़ुल्फ़-ए-आयाज़ में

7    मैं जो सर-ब-सजदा कभी हुआ, तो ज़मीं से आने लगी सदा         तेरा दिल तो है सनम आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

I have heard this gazal but always miss out a part of the gazal.

Nevertheless, the gazal is also one of the masterpiece by Sir Mahomad Iqbal.

I would try to complete it later from the original Urdu script.

1    तु अभी राह गुजार में हें केदं ए मुकाम से गुजर         मिसर ओ हिजाज से गुजार, पारीस  ए शाम से गुजार

2    जिसका  अमाल हें बे गाराज  उसकि जाजा कुछ ओर हें     हुर   ओ खयाम से गुजार, बादा  ओ  जाम से गुजार

3    गरचे हें दिल कुशा बाहुत हुसन ए फिरगं कि बाहार        तयाराक बुलादं बाल   दाना ओ दाम से गुजार

4    ट

5    कोइ शिगाफ तेरी जरब तुजसे खुशाद शार्ख -ए – गरब    तेजे हिलाल कि तरह ऐश ओ नयाम से गुजार

6    तेरा ईमाम बेहजुर, तेरी नमाज बेसरुर             ऐसी नमाज से गुजर , ऐसे  ईमाम से गुजर

Urdu poetry by Gulzar,

I have typed the some well known gazals of Gulzar , the errors in Hindi are mine.

(1)

हाथ छुठे बभी तो रिस्ते नही छोडा करते                  वक्त की  शाख से लमहे नही तोडा करते।

जिस की  आवाज में सलवट हो  निगाहो मे शिकन       ऐसी तसवीर के तुकडे नही जोडा करते

शायाद जीने को मिला करता हे थोडा थोडा              जाने वालों के लिये दिल नही तोडा करते

लग के साहिल से जो बहाता हे  उसे बहने दो             ऐसी दरिया का कभी रुख नही मोडा करते

(2)

में अपने घर मे ही अजनबी हो गया आ कर               मुझे यहां देखकर मेरी रुह डर गयी हें

सहम् के सब आरजु कोने मे छिपि हे                       लवौ बुझा दी हें अपने चहरे की, हसरतो ने

की शोख पहछानता ही नही                                  मुरादे दहलीज ही पे सर रख के मर गयी हें

मे कीस वतन की तलाश मे चला था घर से               की अपने घर में भी अजनबी हे गया हुं आ कर

(3)

आदतन तुम ने कर दिये वादे                              आदतन हम के   अयेतबार किया

तेरी राहो मे बाराहा रुक कर                               हम के अपना ही इन्तजार किया

अब न मांगेगे जिन्दगी  या रब                             ये गुनाह हम ने   एक बार किया

(4)

नज्म उलझी हुयी हे सिने में                   मिशरे अटके हुये होंटों पर

उडते-फिरते हे तितलियो की तरह           लफज कागज पे बेठते ही नही

कब से बेठा हुं में जानम्                       सादे कागज प लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुक्कमल हे                   इससे बेहतर भी नज्म कया होगी

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